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श्री गोरक्ष (गोरख ) चालीसा लिरिक्स – Shri Goraksha Chalisa Lyrics in Hindi

🕉 1 मिनट पढ़ें · 8 जनवरी 2025
श्री गोरक्ष (गोरख ) चालीसा
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श्री गोरक्ष (गोरख ) चालीसा लिरिक्स Shri Goraksha Chalisa Lyrics in Hindi

गोरखनाथ का जीवन और उत्पत्ति:

गोरख नाथ को गोरक्ष नाथ के नाम से भी जाना जाता है गोरखनाथ का जन्म भारतीयउपमहाद्वीप में 11वीं-12वीं शताब्दी के आसपास हुआ माना जाता है। कुछ कथाएँ बताती हैं कि उनका जन्म उत्तर भारत के कुछ हिस्से में हुआ था, हालांकि उनकी जन्मभूमि को लेकर स्पष्ट जानकारी नहीं है। वे एक महान योगी और साधक थे, जिन्होंने नाथ सम्प्रदाय की नींव रखी। उनकी शिक्षा और साधना की विधियाँ बहुत प्रभावशाली थीं, और उन्होंने अपनी जीवन भर की साधना से तंत्र, मंत्र, योग, और तात्त्विक ज्ञान प्राप्त किया। 

गोरखनाथ के गुरु का नाम मत्स्येन्द्रनाथ था, जो नाथ सम्प्रदाय के प्रमुख गुरु माने जाते हैं। गोरखनाथ ने अपने गुरु से योग और तंत्र-मंत्र की शिक्षा प्राप्त की और नाथ सम्प्रदाय के सिद्धांतों को फैलाने का कार्य किया।

 दोहा-

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गणपति गिरिजा पुत्र को, सिमरूँ बारम्बार।

हाथ जोड़ विनती करूँ, शारद नाम अधार।।

चौपाई-

जय जय जय गोरख अविनाशी, कृपा करो गुरुदेव प्रकाशी।

जय जय जय गोरख गुणज्ञानी, इच्छा रूप योगी वरदानी।।

अलख निरंजन तुम्हरो नामा, सदा करो भक्तन हित कामा।

नाम तुम्हारा जो कोई गावे, जन्म जन्म के दुःख बिश्रावे |

जो कोई गोरक्ष नाम सुनावे, भूत पिशाच निकट नहीं आवे।

ज्ञान तुम्हारा योग से पावे, रूप तुम्हार लख्या ना जावे।

निराकार तुम हो निर्वाणी, महिमा तुम्हरी वेद बखानी।

घट घट के तुम अन्तर्यामी, सिद्ध चौरासी करें प्रणामी।

भस्म अङ्ग गले नाद विराजे, जटा सीस अति सुन्दर साजे।

तुम बिन देव और नहीं दूजा, देव मुनी जन करते पूजा।

चिदानन्द सन्तन हितकारी, मङ़्गल करे अमङ़्गल हारी।

पूरण ब्रह्म सकल घट वासी, गोरक्षनाथ सकल प्रकासी।

गोरक्ष गोरक्ष जो कोई ध्यावे, ब्रह्म रूप के दर्शन पावे।

शङ़्कर रूप धर डमरू बाजे, कानन कुण्डल सुन्दर साजे।

नित्यानन्द है नाम तुम्हारा, असुर मार भक्तन रखवारा।

अति विशाल है रूप तुम्हारा, सुर नर मुनि जन पावं न पारा।

दीन बन्धु दीनन हितकारी, हरो पाप हम शरण तुम्हारी।

योग युक्ति में हो प्रकाशा, सदा करो सन्तन तन वासा।

प्रातःकाल ले नाम तुम्हारा, सिद्धि बढ़े अरु योग प्रचारा।

हठ हठ हठ गोरक्ष हठीले, मार मार वैरी के कीले।

चल चल चल गोरक्ष विकराला, दुश्मन मान करो बेहाला।

जय जय जय गोरक्ष अविनासी, अपने जन की हरो चौरासी।

अचल अगम हैं गोरक्ष योगी, सिद्धि देवो हरो रस भोगी।

काटो मार्ग यम की तुम आई, तुम बिन मेरा कौन सहाई।

अजर अमर है तुम्हरो देहा, सनकादिक सब जोहहिं नेहा।

कोटि न रवि सम तेज तुम्हारा, है प्रसिद्ध जगत उजियारा।

योगी लखें तुम्हारी माया, पार ब्रह्म से ध्यान लगाया।

ध्यान तुम्हारा जो कोई लावे, अष्ट सिद्धि नव निधि घर पावे।

शिव गोरक्ष है नाम तुम्हारा, पापी दुष्ट अधम को तारा।

अगम अगोचर निर्भय नाथा, सदा रहो सन्तन के साथा।

शङ़्कर रूप अवतार तुम्हारा, गोपीचन्द भर्तृहरि को तारा।

सुन लीजो गुरु अरज हमारी, कृपा सिन्धु योगी ब्रह्मचारी।

पूर्ण आस दास की कीजे, सेवक जान ज्ञान को दीजे।

पतित पावन अधम अधारा, तिनके हेतु तुम लेत अवतारा।

अलख निरंजन नाम तुम्हारा, अगम पंथ जिन योग प्रचारा।

जय जय जय गोरक्ष भगवाना, सदा करो भक्तन कल्याना।

जय जय जय गोरक्ष अविनाशी, सेवा करें सिद्ध चौरासी।

जो पढ़ही गोरक्ष चालीसा, होय सिद्ध साक्षी जगदीशा।

बारह पाठ पढ़े नित्य जोई, मनोकामना पूरण होई।

और श्रद्धा से रोट चढ़ावे, हाथ जोड़कर ध्यान लगावे।

दोहा –

सुने सुनावे प्रेमवश, पूजे अपने हाथमन इच्छा सब कामना, पूरे गोरक्षनाथ।

अगम अगोचर नाथ तुम, पारब्रह्म अवतार।

कानन कुण्डल सिर जटा, अंग विभूति अपार।

सिद्ध पुरुष योगेश्वरों, दो मुझको उपदेश।

हर समय सेवा करूँ, सुबह शाम आदेश।

गोरख चालिशा का महत्व:

1.धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व: गोरख चालिशा का पाठ करने से व्यक्ति को मानसिक शांति, आध्यात्मिक उन्नति और भगवान गोरखनाथ के आशीर्वाद प्राप्त होते हैं। यह साधक को ध्यान, योग और साधना में सफलता दिलाने में मदद करता है।

2.शरीरिक और मानसिक लाभ: गोरख चालिशा का नियमित पाठ करने से मन की स्थिरता और शांति मिलती है। यह मानसिक तनाव और अवसाद को कम करता है और आत्मविश्वास में वृद्धि करता है।

3.विघ्नों का नाश: गोरख चालिशा का पाठ करने से जीवन में आने वाली बाधाओं और विघ्नों का नाश होता है। यह व्यक्ति को कठिनाइयों और समस्याओं से उबारने में मदद करता है।

गोरख चालिशा का लाभ:

1.समृद्धि और समृद्धि: गोरख चालिशा का नियमित पाठ घर में सुख-शांति और समृद्धि लाता है। यह आर्थिक परेशानियों से उबारने में मदद करता है।

2.स्वास्थ्य लाभ: गोरख चालिशा का पाठ शारीरिक स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी माना जाता है। यह व्यक्ति को शारीरिक समस्याओं से उबरने में मदद करता है और रोगों से बचाव करता है।

3.आध्यात्मिक उन्नति: यह पाठ व्यक्ति को आध्यात्मिक रूप से जागरूक करता है और उसे भगवान गोरखनाथ के मार्गदर्शन में जीवन को सुधारने का अवसर प्रदान करता है।

4.मन की शांति और संतुलन: गोरख चालिशा का पाठ मानसिक संतुलन बनाए रखता है और मन को शांति प्रदान करता है। यह तनाव और चिंता को कम करने में मदद करता है।

5.शक्तियों का जागरण: यह न केवल मानसिक और शारीरिक शक्ति को जाग्रत करता है, बल्कि व्यक्ति में अदृश्य शक्तियों और उच्च ज्ञान को भी सक्रिय करता है।

गोरखनाथ का योगदान और प्रभाव:

गोरखनाथ का सबसे बड़ा योगदान योग और तंत्र के क्षेत्र में रहा है। उन्होंने योग के माध्यम से आत्मज्ञान प्राप्त किया और इसे साधकों तक पहुँचाया। उनका यह सिद्धांत था कि मनुष्य केवल योग, ध्यान और साधना के द्वारा आत्मा के परम सत्य को पहचान सकता है। वे शरीर और आत्मा के संबंध को समझाने में विश्वास रखते थे और उन्होंने अपने शिष्यों को योग के माध्यम से आत्मज्ञान प्राप्त करने की शिक्षा दी।गोरखनाथ ने कपालकुण्डलिनी योग (Kapal Kundalini Yoga) और हठ योग (Hatha Yoga) के अभ्यास को भी महत्वपूर्ण माना। उनका मानना था कि किसी भी व्यक्ति के लिए शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ रहना जरूरी है, और इसके लिए योग और साधना सबसे उत्तम तरीका है। उन्होंने भिक्षाटन के बजाय ध्यान और साधना के द्वारा आत्मनिर्भरता का संदेश दिया।गोरखनाथ के तंत्र-मंत्र की शिक्षा ने भारतीय तंत्र साधना में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त किया। गोरखनाथ के द्वारा दिए गए मंत्र और साधना विधियाँ आज भी तंत्र साधकों और योगियों के लिए मार्गदर्शक सिद्ध होती हैं। उन्होंने गोरख शिष्य या नाथ सम्प्रदाय के सिद्धांतों को फैलाया, जिसमें साधक को आत्म-साक्षात्कार, तंत्र-मंत्र, ध्यान, और साधना के माध्यम से आत्मज्ञान प्राप्त करने की शिक्षा दी जाती है।

गोरखनाथ के सिद्धांतों का प्रभाव:

गोरखनाथ के सिद्धांत और उपदेश आज भी भारतीय समाज में प्रभावशाली हैं। उनके द्वारा स्थापित नाथ सम्प्रदाय ने भारत में योग और तंत्र के क्षेत्र में एक नई दिशा दी। नाथ सम्प्रदाय के अनुयायी आज भी गोरखनाथ के आदर्शों पर चलते हैं। गोरखनाथ के सिद्धांतों ने न केवल धार्मिक जीवन को प्रभावित किया, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन को भी गहरे रूप से प्रभावित किया।

उनका जीवन एक प्रेरणा है जो यह बताता है कि अगर व्यक्ति सच्चे मन से साधना करता है, तो उसे आत्मज्ञान और आत्मसाक्षात्कार प्राप्त हो सकता है। गोरखनाथ के प्रभाव से न केवल भारत में, बल्कि दुनिया भर में योग और तंत्र की परंपराओं को बढ़ावा मिला।

जीवन की बाधाओं और समस्याओं का निवारण।

मानसिक शांति और आंतरिक शक्ति का अनुभव।

भगवान बालाजी के प्रति गहरा आध्यात्मिक संबंध।

यह भजन भक्तों को आत्मविश्वास और साहस प्रदान करता है, जिससे वे जीवन की कठिन परिस्थितियों का सामना कर सकते हैं। इसके अलावा, इसे गाने से भक्तों के मन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

गोरखनाथ की विरासत:

गोरखनाथ की शिक्षाएँ आज भी जीवित हैं, और गोरखनाथ की पूजा और उनकी वाणी को नाथ सम्प्रदाय के अनुयायी बड़े श्रद्धा भाव से मानते हैं। उनका योगदान न केवल भारतीय योग परंपरा को बढ़ावा देने में था, बल्कि उन्होंने समाज में एक सकारात्मक बदलाव की नींव भी रखी। आज भी उनकी पूजा, ध्यान और साधना विधियाँ कई लोगों के जीवन का हिस्सा हैं।

गोरखनाथ का जीवन यह साबित करता है कि साधना, योग और तंत्र के माध्यम से व्यक्ति आत्मा के सत्य को जान सकता है और जीवन को एक नई दिशा दे सकता है। उनकी शिक्षाएँ आज भी उन लोगों के लिए प्रासंगिक हैं, जो आत्मिक शांति, शक्ति, और ज्ञान की प्राप्ति के लिए योग और साधना की ओर अग्रसर होते हैं।

नाथ पंथ का परिचय

नाथ पंथ भारतीय दर्शन और योग परंपरा की एक प्रमुख धारा है, जिसका उद्भव मध्यकालीन भारत में हुआ। यह पंथ योग, तपस्या, और आत्मज्ञान की गहरी साधना पर आधारित है। नाथ पंथ को शिव परंपरा से जोड़ा जाता है और इसे हठयोग के मूल प्रवर्तकों में से एक माना जाता है। इस पंथ के प्रमुख आचार्यों में गुरु मत्स्येंद्रनाथ और उनके शिष्य गुरु गोरखनाथ का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है।नाथ पंथ का उद्देश्य मानव को भौतिक और आध्यात्मिक स्तर पर समग्र रूप से विकसित करना है। यह आत्मज्ञान, शारीरिक और मानसिक शुद्धि, और उच्च आध्यात्मिक स्थिति प्राप्त करने के मार्ग का परिचय कराता है।

नाथ पंथ की उत्पत्ति और इतिहास

नाथ पंथ का मूल गुरु मत्स्येंद्रनाथ से जुड़ा है, जिन्हें इस परंपरा का प्रवर्तक माना जाता है। मत्स्येंद्रनाथ ने इस परंपरा को योग और तंत्र के सिद्धांतों से समृद्ध किया। उनके शिष्य, गुरु गोरखनाथ, ने नाथ पंथ को व्यापक पहचान दिलाई और इसे आम जनता तक पहुंचाया। गोरखनाथ ने हठयोग के सिद्धांतों का विस्तार किया और योग साधना को व्यवस्थित रूप दिया।नाथ पंथ का उल्लेख कई मध्यकालीन ग्रंथों में मिलता है। इस पंथ ने भारतीय समाज को आध्यात्मिक दिशा देने के साथ-साथ सामाजिक समरसता का भी संदेश दिया। नाथ योगियों ने जाति, धर्म, और भौतिक सीमाओं से परे जाकर सभी के लिए आध्यात्मिक विकास के दरवाजे खोले।

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